संत कबीर जी और मगहरMaghar · Sant Kabir Nagar

संत कबीर जी · दोहे

कबीर के दोहे

कबीर के दोहे सदियों से मौखिक और लिखित परंपरा में सुरक्षित रहे हैं — बीजक, कबीर ग्रंथावली और साखी ग्रंथ जैसे संकलनों के माध्यम से। यहां प्रस्तुत अर्थ इस वेबसाइट के लिए मौलिक रूप से लिखे गए हैं।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।

कबीर कहते हैं कि जब वे संसार में बुराई खोजने निकले, तो कोई बुरा नहीं मिला। जब उन्होंने अपने ही मन को टटोला, तो पाया कि उनसे बुरा और कोई नहीं। यह दोहा आत्म-निरीक्षण और दूसरों को जज करने से पहले स्वयं को देखने की सीख देता है।

अहंकार

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।

यदि गुरु और स्वयं ईश्वर (गोविंद) दोनों एक साथ खड़े हों, तो पहले किसके चरण छुए जाएं? कबीर कहते हैं कि गुरु के प्रति समर्पण होना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर को पहचानने और उस तक पहुंचने का मार्ग दिखाया।

गुरु

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय।।

मिट्टी कुम्हार से कहती है — तू आज मुझे रौंद रहा है, पर एक दिन ऐसा आएगा जब तू भी मिट्टी में मिल जाएगा और मैं तुझे ढक लूंगी। यह दोहा जीवन की नश्वरता और अहंकार की व्यर्थता की याद दिलाता है।

माया

चाह मिटी, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह। जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शहंशाह।।

जब इच्छाएं मिट जाती हैं, तो चिंताएं भी समाप्त हो जाती हैं और मन निश्चिंत हो जाता है। कबीर कहते हैं कि जिसे कुछ भी नहीं चाहिए, वही सच्चा राजा है — सच्चा संतोष ही सबसे बड़ा वैभव है।

आत्मज्ञान

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाही। सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।।

जब तक मेरे भीतर अहंकार (मैं) था, तब तक ईश्वर का अनुभव नहीं हुआ। जब अहंकार मिटा, तो ईश्वर का अनुभव हुआ। जैसे दीपक जलते ही अंधकार अपने आप मिट जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान होते ही अहंकार का अंधकार समाप्त हो जाता है।

अहंकार

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।

बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़कर भी संसार में कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बन पाया। कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति 'प्रेम' के ढाई अक्षर पढ़ और समझ ले, वही वास्तव में विद्वान और ज्ञानी है — शास्त्रीय ज्ञान से बढ़कर प्रेम की अनुभूति है।

प्रेम

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।।

सच्चा साधु सूप (अनाज फटकने का पात्र) के समान होना चाहिए, जो सार (अच्छे अनाज) को रख लेता है और थोथा (भूसा) उड़ा देता है। इसी तरह विवेकवान व्यक्ति सत्य और सार को ग्रहण करता है, व्यर्थ को त्याग देता है।

सत्य

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।

किसी साधु या सज्जन की जाति मत पूछो, उसका ज्ञान पूछो। जैसे तलवार का मोल उसकी धार से होता है, म्यान से नहीं — वैसे ही मनुष्य का मूल्य उसके गुण और ज्ञान से है, जन्म से नहीं।

जाति

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

अपनी निंदा करने वाले को पास ही रखो, यहां तक कि उसके लिए आंगन में कुटिया बनवा दो। क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के भी तुम्हारे स्वभाव को निर्मल कर देता है — आलोचना आत्म-सुधार का अवसर बन सकती है।

आत्मज्ञान

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।।

हे मन, धैर्य रखो, सब कुछ अपने समय पर होता है। माली चाहे सैकड़ों घड़े पानी सींच दे, फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा। यह दोहा जल्दबाज़ी छोड़कर सही समय की प्रतीक्षा करने की सीख देता है।

कर्म

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।

हाथ में माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मन की फिरन (भटकाव) नहीं बदली। कबीर कहते हैं कि हाथ की माला छोड़कर मन की माला फेरो — बाहरी कर्मकांड से अधिक महत्वपूर्ण है भीतर का परिवर्तन।

भक्ति

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

जिन्होंने गहरे पानी में उतरकर खोजा, उन्हें ही सत्य मिला। कबीर कहते हैं कि मैं डूबने के डर से किनारे बैठा रह गया। सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए गहन और साहसिक खोज आवश्यक है, सतही प्रयास पर्याप्त नहीं।

आत्मज्ञान

तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँवन तर होय। कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।।

पैरों तले पड़े एक छोटे तिनके को भी कभी तुच्छ मत समझो। यदि वही तिनका उड़कर आंख में पड़ जाए, तो बहुत पीड़ा देता है। कोई भी व्यक्ति या वस्तु, चाहे कितनी छोटी लगे, उसका अनादर नहीं करना चाहिए।

मानवता

कबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर। ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।।

कबीर बाज़ार में खड़े होकर सबकी भलाई मांगते हैं — न किसी से विशेष मित्रता, न किसी से शत्रुता। यह दोहा समभाव और सार्वभौमिक शुभकामना का संदेश देता है, जो कबीर की मानवतावादी दृष्टि का केंद्र है।

मानवता

माया मुई न मन मुआ, मरि-मरि गया सरीर। आसा त्रिसना न मुई, कह गए दास कबीर।।

शरीर बार-बार मरता है, पर माया (मोह) और मन की तृष्णा (लालसा) नहीं मरती। कबीर कहते हैं कि आशा और तृष्णा को भीतर से जीतना ही सच्ची उपलब्धि है, केवल शरीर का नष्ट होना कुछ नहीं बदलता।

माया

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कहे कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीत।।

हार और जीत मन की ही अवस्था है — मन हारे तो हार, मन जीते तो जीत। कबीर कहते हैं कि ईश्वर की प्राप्ति भी मन के दृढ़ विश्वास से ही होती है। मनोबल जीवन में हर सफलता का आधार है।

कर्म

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। एक दिना छिप जायेगा, ज्यों तारा परभात।।

मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। जैसे सुबह होते ही तारा आकाश से छिप जाता है, वैसे ही एक दिन यह जीवन भी समाप्त हो जाएगा। यह दोहा जीवन की नश्वरता का बोध कराता है।

माया

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढ़े वन माहिं। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं।।

कस्तूरी मृग की अपनी नाभि में ही होती है, पर वह उसे वन में ढूंढता फिरता है। वैसे ही ईश्वर प्रत्येक हृदय में विद्यमान है, पर संसार उसे बाहर खोजता रहता है। सत्य भीतर है, बाहर नहीं।

आत्मज्ञान

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब।।

जो काम कल करना है, उसे आज कर लो, और जो आज करना है, उसे अभी कर लो। क्योंकि एक पल में सब कुछ बदल सकता है — फिर तुम कब करोगे? यह दोहा शुभ कार्य में देरी न करने की सीख देता है।

कर्म

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।।

दुख में तो सभी ईश्वर को याद करते हैं, पर सुख में कोई नहीं करता। कबीर कहते हैं कि यदि व्यक्ति सुख में भी ईश्वर का स्मरण करे, तो दुख आए ही क्यों। सच्ची भक्ति शर्तों पर आधारित नहीं होनी चाहिए।

भक्ति